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Monday, 16 September 2013

त्रिलोचन शास्त्री

Shree trilochan shaastree
त्रिलोचन शास्त्री
         कविवर त्रिलोचन का जन्म भाद्र शुक्ल तृतीया ,सोमवार वि.स. 1974, तदनुसार 20 अगस्त,1917 को कटघरा चिरानी पट्टी, जिला सुल्तानपुर(उत्तरप्रदेश) में हुआ था। उनका वास्तविक नाम वासुदेवसिंह था। इनके पिता का नाम श्री जगरदेवसिंह तथा माता का नाम मनबरता देवी था। इनकी पत्निका नाम जयमूर्ति देवी था।
त्रिलोचन की शिक्षा दोस्तपुर गाँव मे प्रारंभ हुइँ। वाराणसी से उन्होने ‘साहित्यरत्न’ डिग्री हासिल की। इन्होंने एम.ए. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में किया था।
         उन्होने अपने बहुत से सर्जनात्मक कार्यो के द्रारा हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिका और काव्य को नयी दिशा सदी। उन्होने बनारस से प्रकट होती मासिक पत्रिका ‘कहानी’ और प्रेमचन्दजी की प्रस्थापित ‘हंस’ पत्रिका, मासिक पत्र ‘चियत्रलेखा’, और ‘बृहद हिन्दीए कोश’  में संपादन कार्य किया। इन्होंने हिन्दी साहित्य संमेलन,प्रयाग द्वारा निर्गत या प्रकाशित ‘हिन्दी-अंग्रेजी मानक-कोश’ का संपादन हिन्दी शब्द-सागर का संपादन कार्य किया।
कृतित्व
      1. ‘धरती’ – 1945
2. ‘गुलाब और बुलबुल’ –1956
3. ‘दिगन्त’  -1957   
4. ‘ताप के तापे हुए दिन’  -1980
5. ‘शब्द’  -1980
6. ‘उस जनपद का कवि हूँ’ – 1981
7. ‘अरधान’ -1984
8. ‘अमोला’ – 1986

9. ‘चैती’ – 1987   

कविवर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


कविवर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
          कविवर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना छायोवादोत्तर नयी दूसरी पीढी के महत्वपूर्ण कवि है। श्री सर्वेश्वर दतयाल का जन्म 15 सितम्बर 1927 में उत्तरप्रदेश की बस्ती में हुआ था। उनकी शिक्षा एग्लो संस्कृत हाइस्कूल बस्ती; क्वीन्स  कालेज,वाराणसी एवं प्रयाग विश्वविधालय में हुइ थी।
          आजीविका के लिए अध्यापक,क्लर्क,आकाशवाणी के सहायक प्रोडयुसर,’दिनमान’ के उपसंपादक और ‘पराग’ के सम्पादक भी रहे थे। सक्सेनाजी ने साहित्यिक जीवन का आरंभ कविता से किया है। वे ‘प्रतीक’ और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। इसके अतिरिक्त कला,साहित्य,संस्कृति और राजनितिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी लेते रहे। अनेक भाषाओं में उनकी रचनाओं का  अनुवाद भी होता रहा।‘तीसरा सप्तक में संकलित हो एवं अज्ञेय जैसे समर्थ साहित्यकार का सहयोग मिलने से उन्हे जल्दी प्रसिध्धि प्राप्त हुइँ। उन्होने कविता के अतिरिक्त उपन्यास,कहानियाँ, नाटक, यात्रावृत एवं बाल-काव्य भी लिखे है। 1972 में  ‘सोवियेत लेखक संघ’ के निमंत्रण पर पुश्किन काव्य समारोह में सम्मिलित भी हुए थे। आपका आकस्मिक निधन दिल का दौरा पडने से दिल्ली में 24 दिसम्बर, 1983 को हुआ था।
कृतित्व
(क) काव्य- कृतियाँ


1.   काढ की घंटियाँ
2.   बाँस का फूल
3.   एक सूनी नाव
4.   कुआनो नदी
5.   गर्म हवाएँ
6.  कविताएँ-1
7.  कविताएँ-2
8.  जंगल का दर्द
9.  खूटिंयों पर टँगे लोग
10. कोइ मेरे साथ चले


(ख) उपन्यास
      1.उडे हुए रंग
(ग) कहानी-संग्रह
      1.अंधारे पर अंधारा

      2. कुत्तो का मसीहा 

Sunday, 3 February 2013

श्री नागार्जुन


श्री नागार्जुन
           कविवर नागार्जुन का पूरा  नाम श्री वैधनाथ मिश्र ‘यात्री’ है। ये ‘यात्री’ उपनाम से ही अपनी मातृभाषा मैथिली में लिखते थे। बाद में हिन्दी में लिखने लगे और बाबा नागार्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुए। नागार्जुन एक ऐसे कवि है, जो अपने कृतित्व एवं व्यक्तित्व से हिन्दी साहित्य के अन्य कवियों से बिलकुल भिन्न हैं। नागार्जुनजी ने आधुनिक प्रगतिवादी,विचारधारा को अग्र प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
         नागार्जुनजी का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी गांव में सन् 1912 ई. में हुआ। नागार्जुनजी ने परम्परागत ढंग से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की थी। इन्होने पाली भाषा एवं भारत दर्शन का साथ-साथ अध्ययन किया था। बचपन में ही बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडता था। नागार्जुन गृहस्थ जीवन जीने के अतिरिक्त साधु-फक्कडों या रमते-रीम जोगी की तरह घूमते रहते थे। वे बहुत ही संवेदनशील स्वभाव के उग्र एवं भावुक व्यक्ति थे। वे निरंतर डटकर संघर्षो का सामना करते रहे। वे राजनीति में भी भाग लेकर आम जनता के कष्टों को दूर करने के अथाग प्रयत्न करते थे। उन्हें राजनीति से कोई लाभ-प्राप्ति की इच्छा नहीं थी, बल्कि जनहित के लिए वे राजनीति में भाग लेते रहे।
        नागार्जुन कविता के क्षेत्र में प्रगतिशील कवि रहे हैं। नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली,संस्कृत और बंगला में कविताऎ लिखी हैं। कविता के अतिरिक्त कथा-साहित्य के विकास में भी आपका महत्वपूर्ण योगदान हैं।
Ø  कृतित्व
*कविता-संग्रह:

  1.युगधारा
  2.सतरंगे
  3.पंखोवाली
  4.प्यासी पथराई आंखे
  5.तालाबकी मछलियां
  6.चन्दना
7.खिलाडी
8.विप्लव देखा हमने
9.तुमने कहा था
10.पुरानी जूतियों के कोरस
11.हजार-हजार बांहोवाली  

*खंडकाव्य    
        1.भस्मांकुर
*अनुदित मैथिली कविता-संग्रह
        1.चित्रा
        2. पत्रहीन नग्न गाछ
*संस्कृत काव्य
             1.धर्मलोक शतकम्
2.संस्कृत के अनूदित ग्रंथ
*उपन्यास

             1.रतिनाथ की चाची
             2.बाबा बदेसर नाथ
             3.दु:खमोचन
             4.बलचमना
             5.वरुण के बेटे
             6.नई पौध
             7.पारो (मैथिली भाषा में)   

Saturday, 2 February 2013

श्री अज्ञेयजी


श्री अज्ञेयजी
                   ‘अज्ञेयजी‘ का पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन है। उनका जन्म 1911 ई. में कसया-कुशीनगर, उतरप्रदेश में हुआ था। और निधन 1987 में हुआ। अज्ञेयजी के पिताजी पंडित हीरानन्द वात्सायन विख्यात पुरातत्ववेता थे। उनका स्थानांतरण भारत के विभिन्न भागो में समय-समय पर हुआ, जिसके परिणाम ‘अज्ञेय’ का भारत के अनेक स्थानों तथा व्यक्तियों से परिचय हुआ। संभवत: इसी कारण उनमें यायावरी वृति का भी विकास हुआ। स्ज्ञेयजी के पिता संस्कारी तथा स्वाभिमानी थे और तत्कालीन स्कूली शिक्षा की उपयोगिता के बारे में बहुत आश्वस्त नहीं थे, इसी लिए सच्चिदानन्द की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। अज्ञेयजी ने संस्कृत पंडित से रघुवंश, रामायण तथा हितोपदेश पढा, पारसी मौलवी से ‘सादी’ और अमरीकी पादरी से अंग्रेजी का अध्ययन किया।
         निराले व्यक्तित्व के रचनाकार अज्ञेय जहिन्दी प्रयोगवादी धारा के प्रवर्तक एवं ऐसे अकेले कवि हैं, जो हंमेशा विवादो में घिरे रहे। ये विवाद रण्नीति से अधिक विचार-धारा-गत थे। हिन्दी में शुद्ध साहित्य को प्रतिष्ठा दिलाने में उनका महत्वपूर्ण हाथ रहा है। उन्होनें तीन सप्तकों का संपादन भी किया है।
*कृतित्व
 अज्ञेयजी की काव्यकृतियां प्रकाशन सन् के साथ ईस प्रकार है-
1. भग्न दूत 1933
2. इत्यलम् 1946
3.चिन्ता  1947
4.हरी घास पर क्षण भर 1949
5.बावरा अहेरी 1948
6.इन्द्रधनु रोंदे हुए 1957
7.आंगन के पार द्रार 1961
8.सुनहले शैवालिक 1964
9.कितनी नावों में कितनी बार 1967
10.क्योंकि में उसे जानता हूं 1968
11.सागर-मुद्रा 1970
12. पहले में सन्नाटा  बुनता हूं 1973
13.महावृक्ष के नीचे 1977
14.नदी की बांक पर छाया 1982
*उपन्यास
 1.शेखर : एक जीवन प्रथम एवं दूसरा भाग
2. नदी के द्रीप 3.अपने अपने अजनबी 
      

Monday, 28 January 2013

श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
         श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितम्बर  1927 में उत्तर प्रदेश की बस्ती में हुआ था। उनकी शिक्षा एग्लो संस्कृत हाइस्कूल, बस्ती क्वीन्स कोलेज, वाराणसी एवं प्रयाग विश्वविधालय में हुइ थी।
      आजीविका के लिए अध्यापक, क्लर्क, आकाशवाणी के सहायक प्रोड्युसर,’दिनमान’ के उपसम्पादक और ‘पराग’ के सम्पादक भी रहे है। सक्सेनाजी ने साहित्यिक जीवनका आरंभ कविता से किया है। वे ‘प्रतीक’ और अन्य पत्र-पत्रिकाओ में लिखते रहे। इसके अतिरिक्त कला, साहित्य, संस्कृति और राजनीतिक गतिविधियो में सक्रिय हिस्सेदारी लेते रहे। अनेक भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद भी होता रहा।  1972 में ‘सोवियेत लेखक संघ’ के निमंत्रण पर पुश्किन काव्य समारोह में सम्मिलित भी हुए थे। आपका आकस्मिक निधन दिल का दौरा पडने पर दिल्ली में 24 दिसम्बर, 1983 को हुआ था।
       सक्सेनाजी के व्यक्तित्व में व्यंग्य-विनोद की प्रधानता परिलक्षित होती है। वे अपने विशेष काव्य व्यक्तित्व के लिये जाने जाते है। कविवर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना छायावादोत्तर नये दूसरी पीढी के कवियों में महत्वपूर्ण स्थान है। ‘तीसरा सप्तक’ मे6 संकलित हो एवं अज्ञेय जैसे समर्थ साहित्यकार का सहयोग मिलने से उन्हे जल्दी प्रसिध्धि प्राप्त हुइ। उन्हों ने अपनी कंइ महत्वपूर्ण काव्यकृतियों से छ्ठे दशक के बाद की हिन्दी कविता को समृद्ध बनाया है।
    उनके स्वभाव आदि के बारे में अज्ञेयजी ने ‘तृतीय सप्तक’ में लिखा है-
         “ स्वभाव न अच्छा, न बुरा, बाहर से गंभीर सौम्य पर भीतर वैसा नहीं। विपती, संधर्ष, निराशाओं से घनिष्ट परिचय के कारण जरुरत पडने पर खरी बात कह्ने में सबसे आगे। अपनो के बीच बेगानो-सा रहने की और बेगानो को अपना समझने की मोख्य आदत। काहिली, सुस्ती, सोचना अधिक करना कम, अपनी लीक पर चलना और किसी की भी परवाह न करना ये कुछ मुख्य दोष है- दूसरो की द्रष्टि में। आकांक्षा कुछ ऐसा करने की जिससे ये दुनिया बदल सके। पूंजी मन का असंतोष और मित्रो का सहयोग।“
कृतित्व
(क) काव्य कृतियां
1. काठ की घंटियां 2. बांस का फूल 3. एक सूनी नांव 4. कुआनो नदी 5. गर्म हवाए 6. जंगल का दर्द 7. खूटियों पर टांगे लोग 8. कविताए-1-2 9. कोइ मेरे साथ चले।
(ख) उपन्यास
1. उडे हुए रंग।
(ग) कहानी-संग्रह
1. अंधारे पर अंधारा  2.  कुत्तो का मसीहा।
          

श्री त्रिलोचन शास्त्री


श्री त्रिलोचन शास्त्री
        कविवर त्रिलोचन का जन्म भाद्र शुक्ल तृतीया सोमवार वि.स. 1974 तदनुसार 20 अगस्त, 1917 को कटघरा चिरानी पट्टी, लिला सुल्तानपुर (उतर प्रदेश ) में हुआ था। वे त्रिलोचन शास्त्री के नाम से प्रचलित है, परंतु इनका वास्तविक नाम था वासुदेवसिंह। इनके पिता का नाम श्री जगरदेवसिंह तथा माता का नाम मनबरता देवी था। इनकी पत्नी का नाम जयमूर्ति देवी था, जो कवि के जीते ही इस दुनिया से चल बसी थी।
       त्रिलोचन की शिक्षा दोस्तपुर गांव में आरंभ हुइ। वाराणसी से इन्होने ‘साहित्यरत्न’ डिग्री हासिल की। इन्होने एम.ए. ( पूर्वादर्ध) बी.एच.यू. (बनारस हिंदु विश्वविधालय) से अंग्रेजी साहित्य में किया था।            
        त्रिलोचन का समूचा जीवन विविधताओं से भरा हुआ है। उन्होने अपने बहोत से सर्जनात्मक कार्यो के द्वारा हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिका और काव्य को नै दिशा दी। 1930 से 1941 तक इन्होने बनारस से प्रकट होती मासिक पत्रिका ‘कहानी’ के सम्पादन-कार्य में महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान दिया। 1943 से 1946 तक प्रेमचन्दजी की प्रस्थापित ‘हंस’ नामक साहित्यिक-पत्रिका में भी सम्पादन-कार्य किया। 1946 से 1950 तक ये मासिक पत्र ‘चित्ररेखा’ तथा ‘ बृहद हिन्दी कोष ‘ के सहायक सम्पादक रहे।
इसके साथ इनकी साहित्यिक सफर ‘हिन्दी शब्द-सागर’ दनिक पत्र ‘जनवार्ता’ से भी जुडा रहा।
 त्रिलोचन द्रारा  किया गया बहुत सा कार्य उनके संघर्ष को प्रमाणित करता है। इन्होने कई  कोषो के सम्पादन-कार्य में सहयोग दिया। त्रिलोचन की प्रगति शील काव्यधारा के लिए बहुत-से सम्मान जनक पुरुस्कार भी प्राप्त हुए है।
         सन् 1981 में ‘ ताप में तापे हुए दिन ’  नामक काव्य कृति पर त्रिलोचन को ‘ साहित्य अकादमी पुरस्कार ‘ से सम्मानित किया गया था। 1983-84 में ‘गुलाब और बुलबुल’ पर उतर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्रारा सम्मान पुरस्कार प्रदान किया गया था। 1989  में मध्य प्रदेश के पुरस्कार ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया था। 
कृतित्व
1. धरती-1945
2. गुलाब और बुलबुल( गजलो और रुबाइयो का संग्रह) -1946
3. दिगन्त ( सॉनेट-संग्रह) - 1947          
4. ताप के तापे हुए दिन-1980
5.शब्द-1980
6. उस जनपद का कवि हूं -1981
7. अरधान-1984
8. अमोला-1986
9. चैती-1987